Friday, September 13, 2013

फिर सजा हुआ है कुरुक्षेत्र

फिर सजा हुआ है कुरुक्षेत्र,
बस शुरू हो रहा धर्मयुद्ध,
दस बरस से तरस रही है माँ,
सत्ता परिवर्तन, हो देश शुद्ध ।

कितना लूटा उन गुंडों ने,
इस देश को, देश के वासी को,
खिलखिला रही थी जो भूमी,
लुट कर लगती है प्यासी वो ।

नहीं बचा कोई भी मंत्रालय,
सब में घोटाला किया गया,
सुनने में आता है ऐसा,
सौ करोड़ करोड़ तक उड़ा दिया ।

अब अर्थव्यवस्था थर्राती,
यहाँ महँगाई मुद्रा स्फिती,
सोने की चिड़िया बनना था,
पर कर दी है विपरीत स्थिती ।

सीमा पर सात पड़ोसी हैं,
पाकिस्तां चीन बर्मा भूटान,
नेपाल बाँग्लादेश भी है,
श्रीलंका सागर के मध्यस्थान ।

सब बने हुए दुश्मन अपने,
कैसे भारत यूं घिरा पड़ा,
जब चीन की सेना करे प्रवेश,
भारत घुटनों पर गिरा पड़ा ।

इतने पर भी नहीं सुधरे हैं,
नए अस्त्र-शस्त्र न ख़रीद रहे,
टूटा सैनिक का मनोबल,
बस देश की ख़ातिर झेल रहे ।

बाहर की ही बस बात नहीं,
अंदर भी हालत ऐसी है,
माओबादी कहीं जिहादी हैं,
जनता की ऐसी-तैसी है ।

कभी मार भी दो आतंकी को,
ऐसा बवाल उठ पड़ता है,
मानो स्वतंत्रता सेनानी वो,
अंग्रेज़ों से जो लड़ता है ।

विस्फोट करें, गोली दागें,
हक़ है उनका ये जन्मसिद्ध,
गर मार दिया हमने उनको,
खाएँगे हमको ही चील-गिद्ध ।

बहु-बेटी का सम्मान नहीं,
नहीं निकल सकें जब सूर्य अस्त,
हर गली में रावण बैठा है,
मद, काम-वासना में हो मस्त ।

क्या होगा देश के वासियों का,
जब देश ही ना हो सम्मानित,
अब मुफ़्त की रोटी फेंक फेंक,
कर देंगे हमको अपमानित ।

खो रहा हमारा संविधान,
हुआ प्रधान मंत्री चपरासी,
ताक़त हथिया कर बैठी है,
वो परदेसी भारतवासी ।

बन रहे हैं जो क़ानून यहाँ,
मंत्री दिखाई नहीं देता है,
संसद में चिल्लाए विपक्ष,
पर कौन वहाँ पर सुनता है ।

कोलाहल ही कोलाहल है,
कहीं सोच समझ की बात नहीं,
भारतवासी नहीं समझ रहा,
क्यों राष्ट्रहित की नहीं बात कहीं ।

करें राजनीति ये पंथों की,
कहते बाक़ी सब दंगाई,
दंगे तो अब तक रुके नहीं,
बस बढ़ती है अब कठिनाई ।

दस बरस में दंगे हुए कई,
न पुलिस और न पत्रकार,
ना जान बचाने आते हैं,
ना सुनने दें डर की पुकार ।

गुपचुप हिंदू मारा जाता,
नहीं कानोंकान वो ख़बर कहीं,
गर मर जाए कोई मुस्लिम,
तब पत्रकार को सबर नहीं ।

क्या यही तरीक़ा मिला इन्हें,
सांप्रदायिक प्यार बढ़ाने का,
हुए जाते हैं सब दूर-दूर,
ये काम है हमें लड़ाने का ।

हर क्षेत्र में पिछड़े जाते हैं,
दम हो कर भी ग़म खाते हैं,
सोचा था मिलकर रहेंगे सब,
पर वो भी नहीं कर पाते हैं ।

बढ़ गया पाप का बोझ बहुत,
तड़पेगी कितनी यह जननी,
सौ करोड़ कि जनता कहती है,
ओ नेता! पड़ेगी अब सुननी ।

इसी देश में उसका लाल एक,
लेकर उसको आगे चला,
उसे देख-देख कर और भी कुछ,
नेताओं को रस्ता मिला ।

जनता का मन उसपे टिका,
ये लाल बड़ा ही लायक है,
है नाम नरेंद्र मोदी उसका,
ये आज का महा नायक है ।

ये धर्मयुद्ध जो खड़ा हुआ,
वहाँ कांग्रेस यहाँ भाजपा,
जीतें मोदी जी धर्मयुद्ध,
भारत का हर चप्पा-चप्पा ।

तुमसे है देश को आस बहुत,
भारत विकास और सम्रद्धी,
सब मिलकर साथ रहें ताकी,
अब हो व्रद्धी, रिद्धी, सिद्धी ।

न चोर-उचक्के मिले हमें,
न जात-पात का हो झगड़ा,
न पंथ-पंथ में मनमुटाव,
और धर्म देश में हो तगड़ा ।

हम साथ तुम्हारे हर क़दम,
जैसे-जैसे दिन बीतेगा,
इस धर्मयुद्ध में निश्चय ही,
तू "नरेंद्र" मोदी जीतेगा ।

5 comments:

  1. Take a bow my friend !! Loved it !! Ramdhari Singh Dinkar ka veer ras bah raha hai aapki kavita me. God Bless !!

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  3. very well written - will read more on your blog. i too tried to write but seems do not have that kind of awareness / vocabulary and talent. would appreciate if you could find time to read this http://tadviddhi.blogspot.in/2011/11/blog-post_09.html

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  4. BAHUT'HI..ACHHA...sandesha..aur...|..BAHUT...HI..ACHHI..chot...hai....
    abhinandanam...

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